जींद के पशु शल्य चिकित्सक ने पशुओं के ईलाज के लिए बलवंत बार सुकेयर नई तकनीक की विकसित
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जींद के पशु शल्य चिकित्सक ने पशुओं के ईलाज के लिए बलवंत बार सुकेयर नई तकनीक की विकसित

VS News India | Jind : – जीन्द 29 जनवरी जींद के पशु शल्य चिक्तिसक डॉ. बलवंत सिंह ने अपने नाम से बार सुकेयर तकनीक को इजाद किया है। इस तकनीक के माध्यम से पशुओं का ईलाज बेहतर तरीके से किया जा सकता है। पहले पशुओं की हडिडयां टूटने पर उसे काटना पड़ता था,लेकिन इस तकनीक से पशुओं की टूटी हड्डियों को बिना किसी परेशानी के जोडा जा सकता है। यहीं नहीं टूटी हड्डियों को जोडऩे के लिए इस तकनीक का प्रयोग करने के बाद पशु तुरंत खड़ा हो सकता है और घूम-फि र सकता है। इस तकनीक को बलवंत बार सुकेयर नाम दिया गया है।
डॉ. बलवंत के अनुसार पहले पशु की हड्डी टूटने पर इसे जोडऩे के लिए रॉड व पीन इत्यादि उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था।

लेकिन इनके प्रयोग से पशु को संक्रमण होने का खतरा बना रहता था और पशु के ठिक होने के आसार भी कम ही रहते थे। क्योंकि ईलाज के तुरंत बाद पशु खड़ा हो जाता है,जिससे रॉड व पीन वजन नही झेल पाती है,लेकिन यह एक ऐसी तकनीक है,जो पशु का पूरा भार अपने उपर ले लेती है और पशु का रक्त संचार भी बना रहता है। जिससे पशु को दवाईयां व न्यूट्रिशियन ठिक ढंग से मिल पाता है। इस तकनीक को अब कई पशु अस्पतालों में अपनाया जा रहा है। डॉ0 बलवंत ने बताया कि इस नवीनतम तकनीक पर हिसार के लाला लाजपत राय विश्वविद्यालय में रिसर्च करने पर भी विचार किया जा रहा है। इस तकनीक का इस्तेमाल चुहे से लेकर भारी भरकम हाथी तक के ईलाज में किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अब तक गांय,भैस,मोर व अन्य पशु पक्षियों के ईलाज में इस तकनीक का सफलता पूर्वक किया जा चुका है। अब तक 4०० पशु पक्षियों का ईलाज किया जा चुका है। हरियाणा भर से लोग अपने पशुओं की टूटी हडिडयों का ईलाज करवाने के लिए जींद के पॉलिक्निक आ रहे है। उन्होंने बताया कि 25 दिनों में इस तकनीक के माध्यम से पशुओं की टूटी हुई हडिडयों को जोड़ा जा सकता है।

कौन है डॉ0 बलवंत: डॉ0 बलवंत पशु शल्य चिक्तिसक है। फि लहाल वे जींद के पॉलिक्निक के इंचार्ज के पद पर कार्यरत है। डॉ0 बलवंत हर रोज कई पशुओं का ईलाज कर रहे है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक को विकसित करने के लिए कोई ज्यादा जद्वोजहद नही करनी पड़ी मात्र दिल में पशुओं की सेवा करने के जज्बे से ही यह तकनीक एकाएक विकसित हो गई। उन्होंने यह भी बताया कि इस तकनीक का प्रयोग मानव भी कर सकते है,अगर वो चाहें तो। इस तकनीक का इस्तेमाल करना बेहद आसान है। पॉलिक्लिनिक में फिलहाल चार वीएलडीए व पशु शल्य चिक्तिसक तैनात है। सभी को इस तकनीक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण दे दिया गया है ताकि पशुओं के ईलाज में किसी प्रकार की कोई देरी न हो। डॉ0 गौ शालाओं में जाकर भी ऐसी गउओं का ईलाज कर रहे है,जिनकी हडिडयां टूटी हुई है।

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